किसी को ज़िद–ए–सिकंदरी की,तो किसी को तलब है मुमताज़ी का, मेरा ज़मीं–ए–फ़िरदौस है,दीदार–ए–सरकार का।

“रिश्ते की गणित”

उसकी बातें,
उसका नज़रिया,
उसका व्यवहार,
उसकी सोच…….
उसको चाहने वाले लोग, उसे ना चाहने वाले लोग….
ये सब गणित के उस समूह जैसे है…..
जो संख्याओं,
मात्राओं, परिणामों, सूत्रों, तरीकों
उसके गुण,स्वभाव जैसे लगते हैं।
मुझे हमेशा से गणित विषय से
अजीब लगाव और डर दोनो रहा है,
जिसे मैं पढ़ना समझना तो चाहती हूं,
पर कभी समझ ना सकी।
और वो……..
बिल्कुल गणित की तरह मेरे जीवन में रहा है।

वो मेरे ख्वाबों में मेरा उतना अपना है, जितना हकीकत में पराया……

“यादें”

बिल्कुल वैसे ही जैसे….
हाथ छूट जाने पर भी
अंगुलियों को याद रहता है स्पर्श,
शाखों से टूट जाने पर भी,
पत्तों में रहता है हरापन।
बारिश के बाद भी,
पत्तियों पर रुका रहता है जल।
कुछ समय तक मैं भी रहूंगी तुम्हारे
मन में मेरे चले जाने के बाद।

“मतलबी बाजार में एक लड़का है मोहब्बत नाम का, उससे हम जैसा जुड़ाव हुआ….. दरमियान हमारे जाने क्या हुआ मसला…. उसे खोना था तो खोया…. बल्कि मैं अपनी खुदी भी खो बैठी।”

वो बादल की तरह आया जिंदगी मेहताब कर गया, मेरी सूखी, सूनी, बंजर जिंदगी में बरसात कर गया।

“मेरा प्रेम”

प्रेम सच या झूठ नही होता
प्रेम तो बस प्रेम होता है।
सभी प्रेम को अपना
समय चाहिए होता है।
प्रेम बदलता है
समय के साथ साथ।
केवल मनुष्य ही नहीं
प्रेम भी परिपक्व होता है।
प्रेम चाहता है उसे स्वतंत्र रखा जाए
समय के साथ नियति के हाथों में,
ताकि व्यक्ति के न होने पर भी उसका प्रेम सदैव चलता रहे।
जैसे हमारा प्रेम सदैव
जीवित रहेगा
और घूमेगा,
स्वतंत्रता पूर्वक तुम्हरे व्यस्त और जिम्मेदार
जीवन के इर्द –गिर्द।

“संवेग”

प्रेम एक दिन तय करता है
कि वह….
अपने प्रियतम को कभी नहीं छोड़ेगा
हमेशा साथ रहेगा।
फिर चाहे स्थिति कितनी भी
विपरीत क्यों ना हो जाए।
लेकिन वक्त बदलते ही….
वो चला जाता है,
दूर बहुत दूर……
और हम देखते रहते हैं जाते हुए,
किसी पत्थर से टकराकर बहती नदी की भांति।
उसका जाना मुझे पत्थर बनाता है
मेरा पत्थर हो जाना उसे नदी।
उसे कभी एहसाह ही नहीं हुआ
मुझे हमेशा से उसके बहाव से प्रेम था।
मैने हमेशा से उसे
घाट के एक छोर से बहते हुए देखा है।